श्रावणी मेला में शिव की कृपा से भगवा भगवा हो रहें सुल्तानगंज, यहाँ आने के बाद शिव भक्तों की जानें विशेषता

रिपोर्ट – चतुरानंद मिश्रा

श्रावणी मेला को लेकर शिव भक्तों में एक गज़ब का उत्साह और भगवान शिव शंकर के प्रति एक अद्भुत अल्कल्पनीय श्रद्धा भाव पूरे सावन माह देखा जाता है। जहां भगवा वस्त्र पहन कर श्रद्धालु स्वयं से रचित मानव के द्वारा ईश्वर के प्रति एक रंग में रंग कर येसा श्रृंखला बनाते हैं जिसे देख कर दुनिया भी दंग रह जाती हैं । श्रावणी मेला दुनिया का सबसे लंबा और धार्मिक मेला मेला माना जाता है। श्रावण माह की कथा का वृतांत कहते हुए देश के मशहूर कथा वाचक व शेखपुरा ज़िला के नाम को गौरवान्वित करने वाले शेखोपुर सराय प्रखंड के निमी गांव में जन्मे दिवाकर वेदान्श जी महाराज कहते हैं कि भगवान शिव जी का परम प्रिय माह सावन का पवित्र महीना है । जिस महिने में ज्योर्तिलिंग रावणेश्वर महादेव पर गंगा जल के अभिषेक करने की सदियों पुरानी परंपरा है। इस अवधि के दौरान लाखों श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ मंदिर में इकट्ठा होते है। उनमें से ज्यादातर लोग सबसे पहले सुल्तानगंज आते हैं, जहां से जल को उठाकर पैदल पांव 105 किमी दूर तय कर पूरी श्रद्धा भाव से बैधनाथ धाम में स्थित ज्योर्तिलिंग पर जला अभिषेक कर और दर्शन पाकर अपने आप को कृतार्थ करते हैं । बाबा की नागरी पहुंचने के लिए देश के कोने कोने से कांवड़ का अलग अलग नजारे भी देखने को मिलते हैं। देश के कोने कोने से पहुंचे कांबड़ियों का हुजूम सुल्तांगज में इकट्ठा होती हैं। जहां की नजारा देखने में यूं प्रतित होता हैं। जैसे की पुरी दुनिया भगवा रंग में समाहित हों चुकी है। ऐसा हीं नजारा दूसरी सोमबारी को देखने को मिला हैं। जिसे देख ऐसा महसूस करेंगे की बस यही वो जगह हैं। जहां हकीकत व वास्तव का मानव प्रेम देखता हैं । श्रद्धा भाव के भाव में जुड़े हर एक समुदाय के लोगों में एक दूसरे के प्रति प्रेम व एक दूसरे को मदद करने का भाव होता हैं। जहां कठिन रास्ते में श्रद्धालु एक दूसरे के लिए मददगार बनते हुए उनके कठिन रास्ते की सहजता प्रदान करते हैं। विदित हों की यह दुनिया का सबसे लंबा धार्मिक मेला होता हैं जहां विदेशी भूमि के लोग न केवल श्रावण महीने में बल्कि शेष वर्ष के दौरान भी बाबाधाम जाते और आते दिखाई देते हैं। कथावाचक दिवाकर वेदांश जी महाराज कहते हैं कि भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन का इतिहास समुद्र मंथन से जुड़ा है, जब देवता और बुरी शक्तियां (असुर) अमृत या अमरता के अमृत की तलाश में एक साथ आए थे। इस घटना के कारण समुद्र मंथन हुआ, जिससे आभूषण और जानवरों सहित कई चीजें निकलीं थीं। जहां समुंद्र मंथन के दौरान विषैले घड़े को भगवान शंकर ने स्वीकृत कर विष का पान किया था। जिसकी उत्तेजना को शांत करने के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम सावान माह में शंकर जी पर जला अभिषेक कर उनके रौद्र रूप को शांत किया। जिसके बाद जला अभिषेक की महत्व का वृतांत बताकर श्रद्धालुओ का मन प्रसन्न किया। तभी से जला अभिषेक की महहतवा चल पड़ी सावन का महीना हिंदुओं के पवित्र चातुर्मास में से एक माना जाता है. इस महीने का संबंध पूर्ण रूप से शिवजी से माना जाता है. माना जाता है की हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार , जो अविवाहित महिलाएं मनचाहा जीवनसाथी पाना चाहती हैं, उनके लिए श्रावण मास बहुत महत्वपूर्ण होता है। ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएं सावन के सोमवार का व्रत रखती हैं, भगवान शिव उन्हें सुख, स्वास्थ्य, धन और मनोवांछित इच्छा पूर्ति का आशीर्वाद देते हैं भक्तगण 22 जुलाई से 19 अगस्त 2024 तक भगवान शिव को समर्पित श्रावण मास का स्मरण करते हैं। इस अवधि के दौरान पूजा करने के मुख्य लाभों में मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, वित्तीय वृद्धि, ग्रह दोष से सुरक्षा और विवाह की बेहतर संभावनाएं शामिल हैं । बैधनाथ धाम से शिव जी जला अभिषेक करने के बाद जब भक्त गण अपने घर पहुंचे तो उन्हें पर सावन मास में घी का दान अवश्य करना चहिए ये विशेष फलदायी माना जाता है। जबकि मानव पर कालसर्प दोष हों तो उससे मुक्ति पाने के लिए सावन के महीने में तांबे, कांसे या चांदी से बने नाग-नागिन का जोड़ा किसी मंदिर या पवित्र स्थान पर दान करें। इसके अलावा मोक्ष की प्राप्ति के लिए सावन के महीने अन्न, कुर्सी व छतरी का दान करना शुभ होता हैं। गांव घरों में बने शिवलायों पर पहुंच कर सूर्योदय से पहले शिव शंकर के प्रतिमा पर जला अभिषेक कर संध्या बेला में भजन कीर्तन अवश्य करें।

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