रिपोर्ट धर्मेंद्र कुमार

शेखपुरा. श्री कृष्ण जन्माष्टमी जिले भर में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है. इस मौके पर लोग मंदिरों और ठाकुरबाड़ियों में भगवान श्री कृष्ण की पूजा अर्चना करने में जूटे हैं. यह पर्व भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है। श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है, जो धरती पर अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए थे। श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में कंस के कारागार में हुआ था। उनके जन्म के समय, मथुरा का राजा कंस, जो श्रीकृष्ण की माता देवकी का भाई था, बहुत अत्याचारी और अधर्मी था। कंस को एक आकाशवाणी के माध्यम से यह ज्ञात हुआ था कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। इस डर से, कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया और उनके पहले छह पुत्रों की हत्या कर दी। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था। जब उनका जन्म हुआ, तो जेल के दरवाजे अपने आप खुल गए और वसुदेव उन्हें टोकरी में रखकर यमुना नदी पार कर गोकुल पहुंच गए। वहां उन्होंने कृष्ण को नंद और यशोदा के पास छोड़ दिया और यशोदा की नवजात बेटी को लेकर मथुरा लौट आए। जब कंस ने उस बच्ची को मारने की कोशिश की, तो वह बच्ची देवी दुर्गा के रूप में प्रकट हुई और कंस को चेतावनी दी कि उसका विनाश निश्चित है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल से ही अद्भुत लीलाएं कीं और अंततः कंस का वध करके मथुरा को अत्याचार से मुक्त किया। जन्माष्टमी के दिन, भक्त श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का स्मरण करते हैं और उन्हें अपने घरों और मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना करके प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। इस दिन उपवास रखकर, रात्रि जागरण कर और भजन-कीर्तन करके भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी न केवल धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह भक्तों के लिए भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं से प्रेरणा लेने का भी अवसर है। यह पर्व हमें सिखाता है कि भगवान सदा अपने भक्तों के साथ हैं और धर्म की स्थापना के लिए किसी भी परिस्थिति में अवतार ले सकते हैं।









