बरबीघा विधानसभा मै किसकी होगी ताजपोसी

 

बरबीघा में सजेगी सियासी जंग — किसके सिर सजेगा ताज?

एनडीए से कुमार पुष्पजाय, कांग्रेस से त्रिशूलधारी सिंह और निर्दलीय सुदर्शन कुमार के बीच त्रिकोणीय मुकाबला

बरबीघा (शेखपुरा)। सौरभ कुमार का रिपोर्ट 

बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच शेखपुरा की बरबीघा सीट एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मुकाबला सीधा नहीं, बल्कि तीन ध्रुवों में बंटा हुआ दिखाई दे रहा है।
एनडीए ने जहां युवा चेहरे कुमार पुष्पजाय पर भरोसा जताया है, वहीं कांग्रेस ने अपने पुराने सियासी गढ़ को वापस पाने की कोशिश में त्रिशूलधारी सिंह को मैदान में उतारा है। उधर, वर्तमान विधायक सुदर्शन कुमार ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोककर समीकरणों में बड़ा बदलाव ला दिया है।

बरबीघा में फिर गरमाई राजनीति

बरबीघा सीट का सियासी इतिहास काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है। कांग्रेस इस सीट पर कभी अपना दबदबा रखती थी, जबकि पिछले चुनाव में सुदर्शन कुमार ने जेडीयू के टिकट पर बेहद कम अंतर से जीत दर्ज की थी
इस बार उन्होंने पार्टी से अलग होकर निर्दलीय रूप से मैदान में उतरने का फैसला किया है, जिससे एनडीए और महागठबंधन — दोनों के समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं।

 

कुमार पुष्पजाय पर एनडीए का दांव

एनडीए ने इस सीट पर नया चेहरा पेश किया है। कुमार पुष्पजाय स्थानीय स्तर पर शिक्षित और सक्रिय माने जाते हैं। वे संगठन में लंबे समय से जुड़े हैं और युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही है। गठबंधन को उम्मीद है कि नए चेहरे की ऊर्जा बरबीघा में “परिवर्तन की लहर” ला सकती है।

कांग्रेस की वापसी की कोशिश

कांग्रेस ने अपने पुराने सिपाही त्रिशूलधारी सिंह को मैदान में उतारा है। पार्टी को उम्मीद है कि जातीय और पारंपरिक वोट बैंक के साथ-साथ स्थानीय असंतोष का लाभ उन्हें मिल सकता है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी इस बार मैदान में पूरी ताकत झोंक दी है।

निर्दलीय सुदर्शन कुमार बने “किंगमेकर” या “किंग”

वर्तमान विधायक सुदर्शन कुमार का निर्दलीय उतरना चुनावी माहौल में सबसे बड़ा ट्विस्ट माना जा रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि “बरबीघा की जनता व्यक्ति को देखती है, पार्टी को नहीं।”
यदि सुदर्शन कुमार ने पिछले बार की तरह व्यक्तिगत लोकप्रियता को बनाए रखा, तो वे या तो फिर से ताज पहन सकते हैं या फिर किसी के भी समीकरण को पलट सकते हैं।

क्या कहता है राजनीतिक गणित?

बरबीघा सीट पर मतदाताओं का झुकाव अब तक जातीय समीकरणों और स्थानीय मुद्दों के मिश्रण पर निर्भर रहा है। विकास, बेरोजगारी और सड़क-शिक्षा जैसे मुद्दे यहां के मुख्य एजेंडा बरबीघा को अनुमंडल बनना  हैं।
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि वोटों का मामूली विभाजन ही जीत-हार तय करेगा।
मतदान के दिन तक माहौल में और भी कई नए समीकरण बन सकते हैं।

जनता बोले — काम बोलेगा या दल बोलेगा?

बरबीघा के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है —

“इस बार बरबीघा किसके नाम करेगा?”

अब देखना यह होगा कि जनता काम को वोट देगी या दल को?
बरबीघा का ताज किसके सिर सजेगा — यह तो जनता का फैसला बताएगा, लेकिन इतना तय है कि बरबीघा इस बार बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक बन चुकी है।

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